सुरभि सेवा
धर्म: जब इवेंट का हिस्सा बन जाए

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धर्म: जब इवेंट का हिस्सा बन जाए

यह कोई बहुत प्राचीन समय की बात नहीं है। सिर्फ़ बीस–तीस वर्ष पहले की ही तो बात है। जब रामायण सीरियल में राम, लक्ष्मण और सीता का चरित्र निभाने वाले पात्र सामान्य जीवन में कहीं दिखाई देते थे, तो लोग अपने आप नतमस्तक हो जाते थे। हम जानते थे कि वे कलाकार हैं, फिर भी रामायण का भाव इतना जीवित और पवित्र होता था कि मन स्वतः झुक जाता था। वह झुकना व्यक्ति के लिए नहीं था, उस भाव के लिए था जिसमें देवत्व सुरक्षित था। लेकिन आज समय बहुत नहीं बदला है, हम बदल गए हैं। आज हम कहते हैं — मेरी शादी है, मेरा कार्यक्रम है, मेरा मंच है। और राधा–कृष्ण मेरे उत्सव की शोभा बन जाते हैं, कभी हमारे साथ नाचते हुए, कभी हमें नचाते हुए — जैसे देवत्व नहीं, कोई प्रस्तुति हो। कभी हम देवत्व के सामने खड़े नहीं हो पाते थे, आज उसे अपने साथ नचा लेते हैं। यह परिवर्तन बाहर नहीं हुआ है, यह भीतर घटा है। हमने कृष्ण को कर्म और विवेक से अलग कर नृत्य और दृश्य में बाँध दिया। और जब कृष्ण इवेंट बन गए, गीता मौन हो गई। यहीं से धर्म की सबसे कठोर परीक्षा शुरू होती है — यदि ईश्वर बिना लीला, बिना मंच, बिना प्रमाण हमारे सामने प्रकट हो जाएँ — तो क्या हम झुकेंगे? या पहले प्रमाण माँगेंगे? जिस समाज में ईश्वर से भी सबूत माँगा जाए, वहाँ समस्या ईश्वर की नहीं, दृष्टि की होती है। क्योंकि जब श्रद्धा क्षीण होती है, तो प्रमाण की माँग बढ़ जाती है। ईश्वर शोर में नहीं उतरता, वह मौन में प्रकट होता है। ईश्वर प्रदर्शन नहीं, समर्पण में प्रकट होता है। शायद आज आवश्यकता नए कार्यक्रमों की नहीं, पुराने भाव की है। उस भाव की जो मूर्ति पर रुकता नहीं था, जो साकार से आगे बढ़कर निराकार को खोजता था। ईश्वर दिखने में नहीं था, इसलिए पहचान में था।

मूल प्रकाशन: surbhi-sewa.blogspot.com